बढ़ता बचपन: एक नए सफर की शुरुवात

ज़िन्दगी की शुरुवात बहुत ही आसान होती है पर राह में चलते हुए हम इससे इतना ज़्यादा उलझा देते हैं की हम खुद इसका मकसद भूल जाते हैं. ये बात समझने के लिए ज़रूरी है की हम बचपन को समझे और सीखे की ज़िन्दगी की शुरुवात कैसी थी और किस तरह हमने उससे बदल दिया

ये पंक्तिया आपको याद दिलाएंगी की कैसे बढ़ने की चाह में हम खुद को कही पीछे छोड़ आए

Life is simple, and starts with a child trying to experience and understand life. Along the way, we complicate things and get stuck in the maze of life.

These are some lines taken from the life of an adult who remembers his/her childhood.

बचपन के न जाने क्या राज़ हैं ,
असमझ होते हुए भी , खुशिया हज़ार है
हर चीज़ से दोस्ती , हर शक्स से प्यार ,
हर बच्चे का अलग होता है अंदाज़ .

फिर हुई बड़े होने की शुरुवात ,
धीरे धीरे समझ आये दुनिया के राज़
डर और भए समझ में आया ,
विश्वास का प्रमाण क्या है वो सिखाया

दोस्ती में हम यू रम गए ,
खेलना और कूदना ही ज़िन्दगी के लक्ष्य बन गए
स्कूल जाने का एक चस्का सा लग गया ,
घर वपस आना सजा बन गया

फिर शुरू हुई बोर्ड की तैयारी ,
पढाई , कॉलेज , नौकरी सब पड़ने लगे भारी .
विज्ञान और मैथ्स में ऐसे उलझ गए ,
ना चाहते हुए भी दोस्त पीछे छूट गए

अब था नयी रेस का काल,
12th के बाद क्या , था सबका सवाल
इंजीनियरिंग , मेडिकल या फिर कुछ और है प्लान ,
इस कशमशक में भूल गए हम अपने अस्तित्व की पहचान

हममे दुसरो के जाने का दुःख होता है, पर हम भूल जाते है की हम बड़े होते हुए खुद के भी कुछ अंश खो देते है। ज़रूरी है की हम उन्हें संजो कर रखे ताकि कभी वापस मुड़ कर देखो तो ये ना लगे की मैं कहा हूँ.

Bachpan

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